हमारे पूर्वजों के ज्ञान आज के विज्ञान की आधारशिला हैं

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हमारे पूर्वजों के ज्ञान आज के विज्ञान की आधारशिला हैं

जिन तथ्यों को हम आज वैज्ञियानिक सत्य मानते हैं, उन की जानकारी का श्रेय उन लोगों को जाता है जिन्हें हम वनवासी कहते हैं। वही हमारे पूर्वज थे। वनवासियों ने निजि अनुभूतियों से प्राकृतिक तथ्यों का ज्ञान संचित कर के आने वाली पीढि़यों के लिये संकलन किया। वही ज्ञान आज के विज्ञान की आधारशिला हैं।

हमारे पूर्वजों के ज्ञान आज के विज्ञान की आधारशिला हैं
हमारे पूर्वजों के ज्ञान आज के विज्ञान की आधारशिला हैं

सृष्टि की रचना अणुओं से हुई है

सृष्टि की रचना अणुओं से हुई है जो शक्ति से परिपूर्ण हैं और सदा ही स्वचालति रहते हैं। पर्वत झीलें, महासागर, पशु-पक्षी, तथा मानव उन्हीं अणुकणों के भिन्न भिन्न रूप हैं। सृष्टि में जीवन इसी प्रकार अनादि काल से चल रहा है।

सृष्टि में जीवन दो प्रकार के हैं – जड़ और चैतन्य। सभी प्रकार  की वनस्पतियां जड जीवन की श्रेणी में  आतीं हैं। इन का जीवन वातावरण पर निर्भर करता है। चैतन्य श्रैणी में पशु-पक्षी, जलचर तथा मानव आते हैं। इन का जीवन भी वातावरण पर आधारित है, किन्तु इन के पास जीवित रहने के अन्य विकल्प भी हैं। यह प्रतिकूल वातावरण से अनुकूल वातावरण में अपने आप स्थानान्तरण कर सकते हैं। अपने – आप को वातावरण के अनुसार थोड़ा बहुत ढाल सकते हैं, अपने भोजन, आवास तथा सुरक्षा के लिये अन्य विकल्प भी ढूंड सकते हैं। जड़ प्राणी परिवर्तनशील नहीं होते इस के विपरीत चैतन्य प्राणी परिवर्तनशील होते हैं।

सृष्टि की रचना अणुओं से हुई है
सृष्टि की रचना अणुओं से हुई है

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मानव की उत्तरदाईत्व

मानव ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो ना केवल अपने आप को वातावरण के अनुरूप ढाल सकता है अपितु वातावरण को भी परिवर्तित करने की क्षमता प्राप्त कर चुका है। अपने उपलब्धियों से मानव ने ना केवल अपने जीवन को परिवर्तित किया है बल्कि अन्य जड़ एवं चैतन्य प्राणियों के जीवन में भी अपना अधिकार बना लिया है। समस्त प्राणियों में श्रेष्टता प्राप्त कर लेने के फलस्वरूप मानवों का यह उत्तरदाईत्व भी है कि वह अन्य प्राणियों के संरक्षण के लिये परियावरण की रक्षा भी करें क्योंकि मानव पशु-पक्षियों तथा अन्य प्राणियों से अधिक सक्ष्म भी हैं।

समान और भिन्नता
समान और भिन्नता

समान और भिन्नता

जीवन आत्मा के बल पर चलता है। आत्मा ही हर प्राणी के अन्दर निवास करती है तथा हर प्राणी की देह का संचालन करती है। आत्मा हर प्राणी की शारीरिक क्षमता के अनुसार भिन्न भिन्न क्रियायें करवाती है। आत्मिक विचार से सभी प्राणी समान हैं किन्तु शरीरिक विचार से उन में भिन्नता है। समस्त प्राणियों के शरीर में सामन्यता एक जैसी क्रियात्मक प्रणालियां हैं जैसे कि रक्तसंचार, श्वास, पाचन तथा स्नायु प्रणाली इत्यादी। इन समानताओं के आधार पर निस्सन्देह सभी प्राणियों का सृजनकर्ता कोई एक ही है क्योंकि सभी प्राणियों में ऐक ही सृजनकर्ता की छवि का प्रत्यक्ष आभास होता है। थोड़ी बहुत विभिन्नता तो केवल शरीरों में ही है। सभी प्राणियों में ऐक ही सर्जन कर्ता की छवि निहारना तथा सभी प्रणियों को समान समझना ऐक वैज्ञिानिक तथ्य है अन्धविशवास नहीं।

 

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