आप अपनी असीम क्षमताओं से अनजान क्यों रहतें हैं

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आप अपनी असीम क्षमताओं से अनजान क्यों रहतें हैं

क्या आप जानते हैं कि आपके अंदर में कितनी शक्ति है? नहीं जानते हैं। यदि जानते हैं, तो आप नहीं कहेंगे कि आत्मा नहीं है। भले आप कह सकते हैं की आत्मा नहीं है, इसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं। पर आत्मा नहीं है, यह मानकर आप खुद ही अनंत आनंद से वंचित रहते हैं तो मैं कहता हूं कि आप चेतन मन के चंगुल में फंसे हैं। इसीलिए आप अपनी असीम क्षमताओं से अनजान हैं। आप अवचेतन मन को अवसर दीजिये, फिर देखें कि आपकी क्षमताएं किस प्रकार प्रकट होती हैं और आप कितने शक्तिशाली बनते हैं। आप एक मनोवैज्ञानिक से पूछें कि चेतन मन की तुलना में अवचेतन मन कितना शक्तिशाली है? भारतीय आध्यात्मिक गुरुओं ने ध्यान को सवोर्परि क्यों माना? इन सवालों का जवाब यह है कि चेतन मन को एकाग्र किए बिना अचेतन मन क्रियाशील नहीं बनता। उसके क्रियाशील बने बिना शक्तियां प्रकट नहीं होतीं।

आप अपनी असीम क्षमताओं से अनजान क्यों रहतें हैं
आप अपनी असीम क्षमताओं से अनजान क्यों रहतें हैं

अवचेतन मन को अपनी शक्ति के प्रदर्शन का मौका दें।

आप प्रवृत्ति की रट लगाते-लगाते सत्य से बहुत दूर जा बैठे हैं। प्रवृत्ति यानी चंचलता। यह आप के जीवन का नियम हो सकता है, पर सत्य आप के जीवन का नियम नहीं है। वह अस्तित्व का नियम है। उसे आप निवृत्ति के द्वारा ही पा सकते हैं। निवृत्ति यानी स्थिरता। आप स्थिर जल में ही अपना प्रतिबिंब देख सकते हैं, चंचल में नहीं। आप सत्य की खोज करना चाहते हैं, तो और कुछ मत करें, केवल ध्यान करें। चेतन मन को एकाग्र करें। अवचेतन मन को अपनी शक्ति के प्रदर्शन का मौका दें।

अवचेतन मन को अपनी शक्ति के प्रदर्शन का मौका दें।
अवचेतन मन को अपनी शक्ति के प्रदर्शन का मौका दें।

ध्यान के द्वारा चित्त की एकाग्रता

ध्यान करें, यह बात कहने में बहुत सरल है। इसे समझने में कोई कठिनाई नहीं। पर बहुधा ऐसा होता है कि शब्दों की सरलता में छिपे हुए भावों की गहराई को नापा नहीं जा सकता। ध्यान के लिए या चित्त की एकाग्रता के लिए बहुत खपना पड़ता है। यह श्रम इसलिए करना है, क्योंकि हमारे चारों ओर चंचल प्रवृत्तियों का वातावरण है। हमारा शरीर चंचल है।हमारी इंदियां चंचल हैं। हमारा मन चंचल है। भूख लगती है, तो इंदियां और मन चंचल हो जाते हैं। देह चंचल हो उठती है। एक प्रवृत्ति दूसरी प्रवृत्ति को जन्म देती है। भूख मिटाने के लिए रोटी जरूरी होती है। उसके लिए धन चाहिए। धन के लिए व्यापार और व्यापार के लिए और बहुत कुछ और चाहिए। इस प्रकार एक प्रवृत्ति के लिए हजार प्रवृत्तियां जरूरी हो जाती हैं। इस शृंखला में आपकी प्रवृत्तियों की कड़ी टूट नहीं पाती।

ध्यान के द्वारा चित्त की एकाग्रता
ध्यान के द्वारा चित्त की एकाग्रता

प्रवृत्ति और निवृत्ति का संतुलन

तो प्रवृत्तियों की यह शृंखला कैसे टूटे?  यह शृंखला तोड़ने के लिए जरूरी है शिथिलीकरण। शिथिलीकरण क्या है? शिथिलीकरण है शरीर और चेष्टाओं की निवृत्ति, भाषा की निवृत्ति और मन की निवृत्ति। जो मन को खाली करना नहीं चाहता, वह शिथिलीकरण को जान ही नहीं सकता, वह उसे कर ही नहीं सकता। प्रवृत्ति जरूरी है, पर साथ ही निवृत्ति भी जरूरी है। दोनों में संतुलन रहना चाहिए। आप की प्रवृत्ति इसलिए प्रबल नहीं बनती है कि आप निवृत्ति को भुलाकर प्रवृत्ति करते हैं। दोनों में संतुलन कैसे बने? जागरण के बाद नींद और नींद के बाद जागरण, यह क्या है? यही है प्रवृत्ति और निवृत्ति का संतुलन।

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निवृत्ति की मेरी परिभाषा है, सबसे बड़ी प्रवृत्ति। निवृत्ति का अर्थ है दूसरे की प्रवृत्ति में पहले की निवृत्ति। प्रवृत्ति सत् का लक्षण है। जिसका अस्तित्व है, उसमें प्रवृत्ति है, सक्रियता है। जिसमें प्रवृत्ति नहीं है, वह असत है।  इसलिए आप निवृत्ति के नाम से मत घबरायें। उसके निकट जाएँ। उसकी आराधना करें। इसमें चलें। आपकी अनंत-शक्ति का स्त्रोत जो सिमटा हुआ है, इससे वह प्रकाश में आ जाएगा तब आप अपनी शक्तियों से परिचित हो जायेंगे।

 

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